बरबूंद

कुमाऊँनी समाज में बरबूंद बनाए जाने की परंपरा की तलाश में निकलें तो बहुत दिलचस्प कहानी दिखलाई देती है। दीवार पर उकेरे गए चटकीले रंगों वाले ये खूबसूरत भद्र दूर से देखने पर कालीन सा आभास देते हैं। कुमाऊँ की ऐपन परंपरा का शायद यह सबसे रंगबिरंगा रूप है।

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शिवालिक के कई दून

देहरादून का नाम तो हम सभी ने सुना है। पहाड़ी रास्तों को पार कर, अगली पहाड़ी श्रंखला शुरू होने से पहले फैला यह घाटीनुमा इलाका राजनैतिक और सामाजिक ही नहीं बल्कि भूगोल व भूगर्भीय विज्ञान के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान से लेकर नेपाल तक ऐसे ही कई ‘दून’ हैं जिनकी उर्वर भूमि सदा से लोगों को आकर्षित आई है।

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तिब्बती व्यापारी

भारतीय हिमालयी सरहदों के ऊँचाई वाले इलाकों में रहने वाले समुदायों का तिब्बती समाज से गहरा रिश्ता रहा है। वर्ष 1957 में अमेरिकी फिल्मकार जे माईकल हैगोपियन ने जाड व्यापारियों के जीवन पर ‘तिब्बतन ट्रेडर्स’नाम से महत्वपूर्ण वृतचित्र बनाया था जिसका ज्ञानिमा ने हिंदी रूपांतरण किया है।

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क्या होती है कीड़ाजड़ी?

पिछले कुछ वर्षों में पहाड़ों में कीड़ाजड़ी की काफी चर्चा हुई है। उच्च हिमालय के कतिपय ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने में इसने अहम् भूमिका निभाई है। उत्तराखंड में कीड़ाजड़ी की स्थिति क्या है इसको लेकर डॉ गिरिजा पांडे ने इसके विशेषज्ञ प्रो. चन्द्र सिंह नेगी से विस्तार से चर्चा की।

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महामारी और इतिहास से सबक

महामारियों का मिजाज और फैलाव का तरीका हमेशा से अकल्पनीय रहा है। सामाजिक और जीव-उद्विकास की अब तक की कहानी भी यही बताती है कि एक बार अस्तित्व में आ जाने के बाद विषाणु का समाप्त होना असंभव है। यानि दुनियाँ में उसका अस्तित्व हमेशा बना रहेगा। अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा होने पर वह बार-बार फैल कर समाज को आतंकित करता रहेगा। हमारे ऐतिहासिक अनुभव भी हमें यही बतलाते रहे हैं।

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कोविड, हम और हमारे गाँव

कोविड ने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत और नीति-नियन्ता के रूप में हमारी क्षमता को बुरी तरह से बेपर्दा कर सामने ला दिया है। यदि अब भी हमनें समय रहते कारगर कदम नहीं उठाए तो गाँवों में उभरते हालात किस तरह की चुनौतियाँ पैदा करेंगे इसका शायद हम अनुमान भी नहीं लगा सकते।

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‘भुला दी गई महामारियों’ से हमने कुछ नहीं सीखा

आज एक बार फिर कोरोना के रूप आई महामारी की भयावहता ने सिद्ध कर दिया है कि हम अंधविश्वास और पोंगापंथी के चलते इस विभीषिका के सामने लाचार होते चले जा रहे हैं। अपने अतीत से हमने कुछ सबक नहीं सीखा। शायद यह हमारी सामूहिक चेतना और वैज्ञानिक समझ का प्रतिफल ही रहा कि महामारियाँ भुला दी गईं और हम इनकी गंभीरता को नहीं समझ सके।

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उत्तराखंड की फागुनी बहारें

भारत में लोक उत्सव गतिशीलता और विविधता के अनूठे उदाहरण हैं। लोक उत्सवों की इस विविधता का एक रूप उत्तराखंड की होली है। यहाँ यह बसंत ऋतु का सबसे महत्वपूर्ण लोक उत्सव है। लम्बे ठिठुरन भरे महीनों के बाद फागुन के आते ही जैसे-जैसे पहाड़ों में तापमान बढ़ना शुरू होता है, प्रकृति भी अपना रूप बदलने लगती हैं।

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क्या ऑनलाइन शिक्षा का दौर आ चुका है?

कहते हैं सीखने की कोई उम्र नहीं होती। जहाँ चाह वहाँ राह। अपनी इस चाहत के चलते मनुष्य ने आजतक अपने मूलभूत अनुभवों से उपजी समझ को ज्ञान के नए-नए रूपों का आकार दिया और धीरे-धीरे उसे परिमार्जित और संश्लेषित कर प्रस्तुत किया है। इंसानी समझ की इसी ताकत ने 21वीं सदी तक आते-आते पारंपरिक तरीकों से सीखने की विधा को नए आयाम दे डाले।

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कुली बेगार आंदोलन के सौ वर्ष

आज से ठीक सौ साल पहले, दस हजार से ज्यादा काश्तकार-किसान बागेश्वर के उत्तरायणी कौतीक में इकठ्ठा होकर ब्रिटिश सरकार की अन्यायपूर्ण नीतियों का विरोध कर रहे थे। देखते ही देखते सभा में उपस्थित ग्राम प्रधानों समेत कई मालगुजारों ने बेगार से जुड़े कुली रजिस्टर सरयू नदी में बहा डाले। यह घटना अंग्रेज सरकार द्वारा अपने नागरिकों के खिलाफ अपनाई जा रही शोषक और अन्यायपूर्ण नीतियों के विरुद्ध उत्तराखंड के किसानों के व्यापक प्रतिरोध की पहली संगठित अभिव्यक्ति थी।

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