मैं तुम्हारा कवि हूँ!

पहली बार जब विद्रोहीजी की कविता सुनी तो मन तृप्त हो गया। कहीं अंदर से आवाज आई – ऐसा होता है कवि ! उनके बारे में जानने की कोशिश की तो मालूम चला की रामशंकर यादव ‘विद्रोही’ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय आए तो पढ़ने थे पर वहाँ से कभी गए नहीं। लगभग 30 साल गुजार दिए उन्होंने जे.एन.यू. के कैंपस में। जहाँ मन किया सो गए। जो मिला खा लिया। और फिर यूँ ही एक दिन, दिसंबर 8, 2015 को, हमेशा के लिए अनंत में विलीन हो गए।

हमेशा इच्छा थी की कुछ और जानूँ इस कवि के बारे में। क्या यह कवि भी पैन पेंसिल से कविताएँ लिखता है या कोरा मन ही इसका कागज है? क्या कवि होना इसकी अभिव्यक्ति का हिस्सा है या इसकी अभिव्यक्ति ही एक कवि होना है? कवि तो सुन कर जानने की इच्छा होती है कि यह जैसा है, वैसा क्यूँ है? क्या इसका भी परिवार है? अगर है तो कहाँ है? क्या एक कवि अच्छा बेटा, पिता, पति भी होता है? या कवि केवल कवि होता है जिसके अतिरिक्त वह क्या या क्यूँ है इसका उसके कवि होने से कोई ताल्लुक नहीं होता? इस तरह के कई सवाल उठते हैं मन में। अक्सर सोचता हूँ की क्या केवल कविता का ईमानदार होना जरूरी है या कवि का ईमानदार होना भी उतना ही जरूरी है? इसलिए बहुत खुशी हुई जब पता लगा की एक विद्रोहीजी पर एक डाक्यूमेंट्री बनी है – “मैं तुम्हारा कवि हूँ!”। लगा अब उत्तर मिल जायेंगे। और मिले भी। पर बहुत कुछ अनुत्तरित भी रह गए।

2011 में बनी 40 मिनटों की डाक्यूमेंट्री “मैं तुम्हारा कवि हूँ” के निर्माता निर्देशक हैं नितिन पमनानी। फिल्म को सह निर्देशित किया है इमरान खान ने, जो इस फिल्म के एडिटर भी हैं। मैंने यह फिल्म कई बार देखी है। इस बहाने विद्रोहीजी को भी बार बार सुनने का मौका मिल जाता है। कुछ और जानने को मिल जाता है विद्रोही सरीखे लोगों के बारे में जो सवालिया निशान लगा जाते हैं हर सोच पर। इनकी कविता दरअसल इनकी मौलिकता और अमर विश्वास है। जिसे हम कविता मानते हैं वह तो बस निचोड़ है उस सोच का जो इस कवि को कवि बनाता है, उसके शब्दों को अमर बनाता है –

इतिहास में वह पहली औरत कौन थी जिसे सबसे पहले जलाया गया?

मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी रही हो मेरी माँ रही होगी,
मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगी
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा?

मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी
और यह मैं नहीं होने दूँगा।

एक औरत की जली हुई लाश

फिल्म के निर्माण के सिलसिले में हमने इमरान खान से कुछ सवाल पूछे। इस लघु साक्षात्कार के अंत में फिल्म का लिंक दिया गया जिसके जरिए आप भी विद्रोहीजी को थोड़ा और करीब से जान सकते हैं।

‘मैं तुम्हारा कवि हूँ’ फिल्म बनाने का विचार क्यों और कैसे आया?

इमरान खान – विद्रोही जी को हम लोग अपने कॉलेज के समय से प्यार करते रहे हैं। उनकी कविताएँ अक्सर दिमाग में बस जाया करती थीं – लूप की तरह। जब कैमरा और माइक हाथ में आया तो लगा की विद्रोही जी को कैप्चर करना चाहिए।

आपने विद्रोही जी को फिल्म के लिए कैसे तैयार किया? क्या यह फिल्म बनाने में काफी समय लगा? कोई कठिनाईयाँ जो आईं हों?

इमरान खान –  वैसे तो हम कभी किसी कॉन्सर्ट में या किसी ईवेंट में विद्रोहीजी की विडिओ रिकॉर्डिंग करते रहते थे। फिर विद्रोहीजी के सामने फिल्म बनाने प्रस्ताव रखा। उन्होंने जब हामी भारी, तब से एडिटिंग का समय मिला कर लगभग 2 साल लग गए फिल्म बनाने में। शूटिंग का पहला दिन था और हम महरौली में एक बाओली में शूटिंग कर रहे थे और हमारा कैमरा पहला शॉट लेते व्यक्त ही खराब हो गया। पर इसके बाद कोई खास मुसीबतें नहीं आई पूरी शूटिंग के दौरान।

इस फिल्म के प्रोटैगनिस्ट (नायक) ही गाइड कर रहे थे की कहानी कहाँ जाए। पहले हमने कोशिश करी की विद्रोहीजी को अपनी नज़रों से दिखाया जाए पर वह रास्ता काम नहीँ किया। फिर फिल्म को दोबारा एडिट किया। विद्रोहीजी ने बिना रोक टोक के खूब सपोर्ट किया पूरे शूटिंग के दौरान।

जिन लोगों ने यह फिल्म देखी उनसे आपको कैसी प्रतिक्रियाएँ मिलीं?

इमरान खान –  जिस किसी ने भी यह फिल्म देखी उसने हमारी खूब हौसला अफजाई की। जो लोग विद्रोहीजी को जानते थे, और जो नहीं भी जानते थे, सभी को फिल्म बहुत पसंद आई।

कुछ खास बातें विद्रोही जी के बारे में जो कहना रह गई फिल्म में?

इमरान खान –  विद्रोहीजी इतनी बड़े शख़्सियत थे की 45 मिनटों में उनको उतार पाना लगभग नामुमकिन है। हम कोशिश करते की उनसे उनकी मनपसंद मिठाई या खाने के बारे में पूछें पर वो चौबीसों घंटे अपनी कविताओं में डूबे रहते। उनको मज़ा ही नहीं आता था अन्य बातों में, सिवाय कविताओं के। उनकी आँखें एक बच्चे की तरह चमकने लगती थी जब वे कविता सुनाते थे। ऐसी बहुत से बातें हैं जिसके बारे में चर्चा करना चाहते थे पर हम उस तरफ जा ही नहीं सके। हमारी इच्छा थी की विद्रोहीजी के बच्चों के साथ एक सीक्वेनस रखें पर हो नहीं पाया।

कुछ खास उपलाधियाँ फिल्म की जो आप शेयर करना चाहेंगे?

इमरान खान –  सबसे बड़ी उपलब्धि तो यह रही की विद्रोहीजी को फिल्म बहुत पसंद आई। उनके चाहने वालों को यह फिल्म आज भी बहुत पसंद है। हम अपने आप को बहुत खुशकिस्मत समझते है की हमें यह फिल्म बनाने का मौका मिला। हमें इस बात का गर्व है की आने वाले नस्लों के लिए विद्रोहीजी हमेशा उपलब्ध रहेंगे। हमारी फिल्म को 2012 में मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के इंटरनेशनल सेगमेंट में पहला सठन मिला। 

मैं तुम्हारा कवि हूँ!

मुझको बचाना उन इंसानों को बचाना है,
जिनकी हड्डियां तालाब में बिखरी पड़ी है.
मुझको बचाना अपने पुरखों को बचाना है,
मुझको बचाना अपने बच्चों को बचाना है,
तुम मुझे बचाओ!
मैं तुम्हारा कवि हूं.

धन्यवाद नितिन और इमरान इस कवि को बचाने के लिए!

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विद्रोहीजी की कई काव्यपाठ यूट्यूब में उपलब्ध हैं। उनकी कई कविताएँ, लिखित रूप में, कविताकोश में दर्ज है।

नवीन पाँगती
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